Wednesday, March 2, 2011

गौर से देखो इस चाँद को ,
और समझो इसकी बात ।
जीवन भी बदला करता है,
जैसे बदले दिन रात ॥
जैसे बदले दिन रात ,
रात के बाद सबेरा ।
पूरक हैं आपस में ये ,
उजाला और अँधेरा ॥
सो दुख से न घबराओ ,
इसमें रोने की क्या बात।
जब भी चाहो कर सकते हो,
नवजीवन की शुरुआत ॥

~ अमित पाण्डेय
27 फरवरी 2011