गौर से देखो इस चाँद को ,
और समझो इसकी बात ।
जीवन भी बदला करता है,
जैसे बदले दिन रात ॥
जैसे बदले दिन रात ,
रात के बाद सबेरा ।
पूरक हैं आपस में ये ,
उजाला और अँधेरा ॥
सो दुख से न घबराओ ,
इसमें रोने की क्या बात।
जब भी चाहो कर सकते हो,
नवजीवन की शुरुआत ॥
~ अमित पाण्डेय
27 फरवरी 2011
और समझो इसकी बात ।
जीवन भी बदला करता है,
जैसे बदले दिन रात ॥
जैसे बदले दिन रात ,
रात के बाद सबेरा ।
पूरक हैं आपस में ये ,
उजाला और अँधेरा ॥
सो दुख से न घबराओ ,
इसमें रोने की क्या बात।
जब भी चाहो कर सकते हो,
नवजीवन की शुरुआत ॥
~ अमित पाण्डेय
27 फरवरी 2011
ब्लॉग की दुनिया में आप का स्वागत ..
ReplyDeleteप्रेरणादायी कृति ....
लिखते रहिएगा..